उज्जैन की युवा धर्म संसद में RSS प्रमुख मोहन भागवत ने धर्म और रिलीजन के बीच अंतर समझाया।


Mohan Bhagwat: उज्जैन के देवास रोड स्थित गीता भवन में आयोजित तीन दिवसीय युवा धर्म संसद के दूसरे दिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने दीप प्रज्वलन और वंदे मातरम के साथ कार्यक्रम का शुभारंभ किया। इस दौरान संघ प्रमुख ने युवाओं को धर्म का वास्तविक अर्थ समझाया और जीवन में इसके महत्व पर मार्गदर्शन दिया।
मोहन भागवत ने कहा कि धर्म रिलीजन नहीं है, बल्कि जीवन का अनुशासन है। किसी इच्छा की पूर्ति, भय, लोभ या प्राण बचाने के लिए भी धर्म का त्याग नहीं करना चाहिए। सुख-दुख आते-जाते रहते हैं, लेकिन धर्म नित्य रहता है। धर्म को लेकर भ्रम का एक कारण अपनी भाषा और धर्म के वास्तविक अर्थ को भूल जाना है। पश्चिमी देशों के लोगों ने भारत में धर्म के आचरण, कर्मकांड और अनुशासन को देखा और उसे अपने यहां के रिलीजन के समान समझ लिया। बाद में भारत में भी धर्म को रिलीजन कहा जाने लगा। जैसे कुश्ती सीखने के लिए अखाड़े में दंड-बैठक लगाना जरूरी है, उसी तरह धर्म के कर्मकांड और अनुशासन उसके अभ्यास का हिस्सा हैं। कर्मकांड धर्म का एक अंग है, लेकिन पूरा धर्म नहीं है।
भागवत ने कहा, हमारा देश हमेशा से मिल-जुलकर रहने वाला रहा है। यह अपने लोगों के बीच भेदभाव नहीं करता है। हमारे लिए 'पंथ-निरपेक्षता' का यही अर्थ है। धर्मनिरपेक्षता की पश्चिमी अवधारणा शासकों और धार्मिक अधिकारियों के बीच संघर्ष से पैदा हुई थी और इसलिए यह भारतीय संदर्भ में उसी तरह से लागू नहीं होती है। संघ प्रमुख ने कहा कि भारत ने पारंपरिक रूप से जीवन के भौतिक और आध्यात्मिक पहलुओं को अलग-अलग करने के बजाय एक साथ देखा है। दोनों को एक-दूसरे का पर्यायवाची नहीं माना जाना चाहिए।
भागवत ने पाकिस्तान का नाम लिए बिना कहा कि पश्चिम दिशा में एक पड़ोसी देश बिना कारण विवाद करता है और बार-बार तकलीफ देता है। उन्होंने कहा कि उसे कई बार सबक भी सिखाया गया, लेकिन भारत ने कभी यह नहीं कहा कि विवाद करने के कारण वह वापस आ जाए या उसके साथ कैसा व्यवहार किया जाए। उन्होंने कहा कि भारत में अलग-अलग विचारधाराओं की सरकारें रही हैं, लेकिन दुनिया के संघर्षों में भारत ने अनावश्यक रूप से हस्तक्षेप नहीं किया। जिन लोगों ने भारत को तकलीफ दी, जरूरत पड़ने पर भारत ने उनकी मदद भी की और यह नहीं देखा कि वहां किस विचारधारा के लोग सत्ता में हैं। भागवत ने कहा कि ऐसा इसलिए है, क्योंकि भारत के डीएनए में धर्म है।
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